नवरात्रि · दिन 1
शैलपुत्री
पर्वतराज हिमालय की पुत्री
मां शैलपुत्री की आरती
शैलपुत्री मां बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार। शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे। ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी। उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के। श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे। मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।
देवी के बारे में
दुर्गा का प्रथम रूप। शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। वे वृषभ पर सवार हैं और हाथों में त्रिशूल और कमल धारण करती हैं। प्रथम दिन उनकी पूजा से नवरात्रि का आरम्भ होता है।
भोग: शुद्ध घी
इसे अपना बनाएँ
वैकल्पिक। आपका नाम और गोत्र संकल्प में भर जाएगा। केवल इसी डिवाइस पर सहेजा जाता है।
पूजा सामग्री
- देवी की तस्वीर या मूर्ति
- लाल वस्त्र (चुनरी) और स्वच्छ आसन
- रोली / कुमकुम, अक्षत
- लाल फूल (गुड़हल देवी को प्रिय है), माला
- अगरबत्ती / धूप, कपूर
- घी या तेल का दीपक, बत्तियाँ
- कलश या छोटे पात्र में जल, आम के पत्ते
- फल, नारियल और उस दिन का भोग
- भोग: शुद्ध घी
पूजा विधि (चरण)
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शुद्धि और तैयारी
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान साफ करें और लाल वस्त्र बिछाएँ। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और देवी की तस्वीर या मूर्ति सामने रखें।
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संकल्प
दाहिने हाथ में जल, थोड़े अक्षत और एक फूल लेकर संकल्प बोलें, फिर जल छोड़ दें। नीचे आपका गोत्र और नाम आपकी सहेजी गई पसंद से भरा जाता है।
मम (आपका गोत्र)-गोत्रे उत्पन्नस्य (आपका नाम)-नाम्नः ममोपात्त-समस्त-दुरित-क्षयद्वारा श्रीदुर्गा-प्रीत्यर्थं नवरात्र-पूजनमहं करिष्ये॥
mama (आपका गोत्र)-gotre utpannasya (आपका नाम)-nāmnaḥ mamopātta-samasta-durita-kṣaya-dvārā shrī-durgā-prītyarthaṃ navarātra-pūjanam ahaṃ kariṣye ||
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गणेश वन्दना
विघ्न दूर करने के लिए सबसे पहले श्री गणेश को प्रणाम करें।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭi samaprabha | nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||
अर्थ: हे वक्रतुण्ड, विशाल देह वाले, करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी देव, मेरे सभी कार्यों को सदा विघ्नरहित करें।
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दीप प्रज्वलन और अर्पण
दीपक और धूप जलाएँ। देवी को रोली, अक्षत, फूल और माला अर्पित करें।
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घटस्थापना (कलश स्थापना)
केवल पहले दिन। कलश में स्वच्छ जल भरें, मुख पर आम के पत्ते रखें और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें। इसे मिट्टी या रेत की परत पर स्थापित करें जिसमें जौ बोए गए हों। दीपक जलाएँ। शुभ मुहूर्त हर वर्ष बदलता है, इसलिए अपने परिवार के पंचांग या पंडित जी से पुष्टि करें।
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ध्यान मन्त्र
क्षण भर नेत्र बन्द करके माँ शैलपुत्री के ध्यान मन्त्र का पाठ करें।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
vande vāñchhita-lābhāya chandrārdha-kṛta-shekharām | vṛṣārūḍhāṃ shūladharāṃ shailaputrīṃ yashasvinīm ||
अर्थ: अर्धचन्द्र को मुकुट रूप में धारण करने वाली, वृषभ पर आरूढ़, त्रिशूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री को मैं मनोवांछित फल के लिए प्रणाम करता हूँ।
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स्तुति
देवी की स्तुति का पाठ करें।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu shakti-rūpeṇa saṃsthitā | namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ ||
अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें बारम्बार नमस्कार है।
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भोग अर्पण
माँ शैलपुत्री को शुद्ध घी का भोग फल और नारियल के साथ अर्पित करें।
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आरती
जलते दीपक या कपूर को देवी के सामने दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाते हुए आरती गाएँ।
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क्षमा प्रार्थना
पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam | pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamasva parameshvari ||
अर्थ: मैं न आवाहन जानता हूँ, न विसर्जन, न ही पूजा की विधि। हे परमेश्वरी, मुझे क्षमा करें।
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प्रसाद वितरण
प्रसाद परिवार और पड़ोसियों में बाँटें, फिर स्वयं ग्रहण करें।